एक मिसाल है गांव भानसोज




मनोज कुमार 
मनोहर देवांगन इन दिनों चर्चा में हैं. चर्चा में इसलिए उसे लगा कि थोड़ी रिश्वत देकर, थोड़ा प्रलोभन देकर पंच की कुर्सी पा लेगा लेकिन उसे क्या पता था कि जिस गांव, जिस गांव वालों को वह प्रलोभन देने की कोशिश में लगा है, वह गांव गांधी के ग्राम स्वराज का गांव है. ग्राम पंचायत भानसोज में पंचायत चुनाव में मनोहर देवांगन पंच प्रत्याशी था. उसने ग्रामीण मतदाताओं को लुभाने के लिए उपहार में कई तरह के सामान दिए. उसे लगा कि एक कुकर, एक कड़ाही और ऐसे ही कुछ घर की जरूरतों के सामान के साथ महिलाओं को मोह लेगा. लालच में आकर उन्हें वोट दे जाएंगी और दिए गए प्रलोभन का वह पंच बनकर चार गुना कमा लेगा. गांव में पंच का रसूख भी पा लेगा लेकिन उसकी चाल फेल हो गई. गांव वालों ने उसके उपहार तो रख लिए लेकिन वोट उसे दिया जो गांव के हितों की रक्षा कर सके. चुनाव परिणाम आया तो मनोहर देवांगन पराजित हो गया था. नैतिक रूप से तो वह पहले से पराजित था. चुनाव में भी उसे हार का सामना करना पड़ा.
पंचायत चुनाव में पराजय ने उसके सपने तोड़ दिए. वह निराश हो गया और गुस्से से बलबलाने लगा. गुस्सा इस कदर आया कि वह गांव वालों के साथ अमर्यादित बर्ताव करने लगा. इसी गुस्से में उसने गांव वालों को ललकारा और दिए गए उपहार वापस करने की मांग रख दी. पलक झपकते ही गांव वालों ने गांव के बस स्टैंड पर उपहारों का ढेर लगा दिया. ऐसा लगने लगा कि यहां सेल लगा हुआ है. उपहारों के बीच शराब की छोटी-छोटी शीशी भी चमक रही थी. मनोहर देवांगन को यकीन ही नहीं हुआ कि गांव वाले उसके वापस मांगने पर उपहार लौटा देंगे. उसे लगा कि उसकी बात अनसुनी कर दी जाएगी. अब तो मनोहर देवांगन को लगा कि वह फंस रहा है. बिना समय गंवाये, वह गांव से नौ दो ग्यारह हो गया. इधर एक महिला ने साहस कर पराजित पंच प्रत्याशी मनोहर देवांगन के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस तत्काल सक्रिय हो उठी और थोड़ी देर में सारे उपहारों की जब्ती बना ली और मनोहर देवांगन को तलाशने चल पड़ी.
मनोहर देवांगन इस बात को जान लेता कि भानसोज दूसरे गांव की तरह ही है. लेकिन एक बात जो उसे दूसरे गांव से अलग करती है वह उस गांव वालों का आत्मविश्वास. जिस गांव के लोगों ने कभी सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया हो, उस गांव में प्रलोभन देने का अर्थ खुद को अंधेरे में रखना था. हुआ भी यही. गांव वाले लालची होते तो मनोहर देवांगन चीखता रहता और कान में रूई डालकर उसके उपहार वापस नहीं करते लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
गांव वालों के आत्मविश्वास की कहानी सुननी है तो आपको 90 के दशक में जाना होगा. करीब करीब 30 वर्ष पुरानी बात है. ग्राम भानसोज आज की तरह जागरूक नहीं था. तमाम किस्म की बुराईंयां, परेशानियां और संकट गांव के रास्ते से गुजरती थी. इसमें सबसे बुरा था गांव के पुरुषों का शराब में डूबे रहना. मां-बहनों के सामने यह संकट भयावह होता जा रहा था. गांव के पुरुष कमाते चवन्नी थे और खर्च रुपय्ये का था. घर में खाने के लाले पड़े रहते थे. जब तब लड़ाई-झगड़ा इस गांव की पहचान बन गया था. आखिरकार थकहार कर मां-बहनों ने शराब के खिलाफ मोर्चा खोला. पहले सरकार से गुहार लगायी कि गांव में जो शराब का शासकीय ठेका दिया गया है, उसे निरस्त किया जाए. लेकिन सरकार ने अनसुनी कर दी थी. सरकार को हर हाल में राजस्व चाहिए था. महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी. गांव में पूर्ण रूप से शराबबंदी का ऐलान कर दिया. पति हो या पिता, भाई हो या देवर, कोई भी पुरुष शराब पीकर आया तो उसे दंड का भागी बनना होगा. कई मर्तबा तो पुरुषों की मार-कुटाई में भी महिलाएं पीछे नहीं हटीं. इसके बाद शराब भट्टी के खिलाफ धरने पर महिलाएं बैठ गईं. दिन पर दिन गुजरते गए. कोई 364 दिन बाद उम्मीद की किरण जागी. सरकार को लगा कि अब मामला बड़ा बन रहा है. वह महिला आंदोलकारियों के समक्ष झुक गई और शासकीय शराब के ठेके को निरस्त करने का ऐलान किया. इस बीच पुुरुषों को भी समझ में आ गया था. एक बड़ी लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलन ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कोई 40 किलोमीटर दूर बसा गांव भानसोज शराबमुक्त गांव बन गया. इस गांव से प्रेरणा लेकर छत्तीसगढ़ के कई गांवों में महिलाओं ने मोर्चा खोला और शराब के खिलाफ खड़ी हुईं. गांधीजी के सत्याग्रह के रास्ते इस आंदोलन को इतनी बड़ी जमीन मिली कि पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय ने अपने शोधार्थियों से भानसोज की शराबबंदी पर रिसर्च कराया. कुछेक विद्यार्थियों को इस पर पीएचडी की उपाधि भी हासिल हुई. बदलते समय में ग्राम भानसोज में भी कुछ परिवर्तन आया होगा लेकिन उसकी जड़ों में स्वाभिमान है और इस स्वाभिमान को मनोहर देवांगन जैसे लोग पहचान नहीं पाते हैं. भानसोज की जड़ें आज भी कितनी मजबूत है, इस बात का प्रमाण है लौटाए गए प्रलोभन में शराब की वह शीशी यह शराब की शीशी नहीं बल्कि भानसोज के विश्वास की पहचान है.